ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करने का सुझाव (Trade Margin Regulation)
एफएसडीए की जांच में सामने आया कि दवा कंपनियां और स्टॉकिस्ट अस्पतालों को 'संस्थागत खरीद' पर बहुत भारी छूट देते हैं। लेकिन अस्पताल इस छूट का लाभ मरीजों को नहीं देते और सीधे प्रिंटेड MRP पर दवाएं बेचते हैं। इसके लिए एफएसडीए ने केंद्र से ट्रेड मार्जिन को युक्तिसंगत बनाने और इस पर सख्त सीमा (प्राइस कैप) तय करने का अनुरोध किया है ताकि मरीजों का शोषण न हो।
'कॉस्ट प्लस' मॉडल अपनाने का सुझाव (Cost Plus Model)
एफएसडीए ने उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों का उदाहरण देते हुए केंद्र को 'कॉस्ट प्लस' मॉडल पर विचार करने का सुझाव दिया है। इस मॉडल के तहत, महंगे इंजेक्शन, हाई-एंड एंटीबायोटिक्स और कैंसर की दवाओं जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं की कीमत तय करते समय मुद्रित एमआरपी (MRP) को अंतिम आधार नहीं माना जाता। इसके बजाय, अस्पताल की वास्तविक खरीद लागत (Actual Purchase Cost) को ध्यान में रखकर ही मरीज से ली जाने वाली अंतिम कीमत तय की जाती है।
एक ही दवा के अलग-अलग ब्रांड्स की कीमतों में विसंगति दूर करना
जांच में यह भी देखा गया कि एक ही सॉल्ट (दवा) होने के बावजूद अलग-अलग ब्रांड्स की एमआरपी में जमीन-आसमान का अंतर है। एफएसडीए ने केंद्र सरकार को इस विसंगति को दूर करने और कीमतों में एकरूपता लाने के लिए नियमों में बदलाव करने का सुझाव दिया है।
एफएसडीए की जांच के चौंकाने वाले आंकड़े
यूपी एफएसडीए ने प्रदेश के प्रमुख शहरों के मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की फार्मेसियों में सघन चेकिंग अभियान चलाया था, जिसमें निम्नलिखित बातें सामने आईं, करीब 36 से अधिक महत्वपूर्ण दवाओं की एमआरपी उनकी वास्तविक खरीद कीमत से 10 से 67 गुना तक अधिक पाई गई। जांच के दौरान एक विशेष इंजेक्शन (Polymyxin-B) की अस्पताल के लिए वास्तविक खरीद कीमत सिर्फ ₹74.09 थी, जबकि उसी पैकेट पर मरीजों से वसूली जाने वाली एमआरपी ₹4,980.94 दर्ज थी। इसी बड़ी मुनाफाखोरी को रोकने के लिए यूपी एफएसडीए ने केंद्र को नियमों में बदलाव के सुझाव भेजे हैं, और खुद राज्य स्तर पर 1 नवंबर से सभी अस्पताल फार्मेसियों के लिए अपनी वेबसाइट व काउंटर पर दवाओं का खरीद रेट और बिक्री रेट सार्वजनिक करना अनिवार्य कर दिया है
